Friday, January 14, 2011

Humsab.......Humlog

आँखों के पर्दों पे,
सपने  संजोये.
पहचान से अलग,
किसी धुन में खोये.
तनहा नही हैं.
साथ है अपनी जिंदगी.
बेतलब आवारगी.
बोलने के लिए,
जब लब्ज़ कम पड़े.
आंखे ही काम आई.
नयने......जल से भरे  पड़े.
हलचल हरकत,
बेमतलब बेवक्त.
संजीदा शुरुआत,
न जाने कैसा अंत.
मंजिल  की ओर,
हर शक्श, हर संत.
देखा जब,
सच से भागती हर नज़र,
नज़रो पे एक जाली.
जाली से सब देखे शहर.
नज़रे फिर हँस पड़ी,
तन्हाई की आदत पड़ी,
ऐसे-वैसे, जैसे-तैसे.
भावनाए, सड़ी-गली.
सच को लांघती सीमायें,
ए लड़की,
तुझे हम क्यों पढाये?
नया  है तू,
क्यों न हम बरगलाये?
.
.
.
और ................ और क्या?
हम सब .........हम लोग.
.....................................
.........................................

Sunday, September 26, 2010

THEN AND NOW

Wistfully,
I swimmed into past.
Gloomy,
How long it will last?

I had choosen a way.
I had nothing to say.
Fighting to me ,by myself.
Deteriorating per day.

Memories,
I was fed up with that.
wanted to decrease,
Trojan, a layer fat.

But Now

I am living in present.
Without any past scent.
Walls of my heart,
With karma, Have a paint.

Relaxed,
I dont think too much.
Attitude changed,
My heart, in my clutch.

I dont know,
Whether I have succeed.
But i am bit confident,
With my every deed.

Monday, September 20, 2010

My Mother

It was almost midnight.
suddenly,
I got vision, a sight.

I saw myself crumbled,
by a crosswind.
Breathing high, feared.

Place was strange.
Dark and unknown.
Wanted to swallow, a revenge.

Running recklessly,
I saw her.
& everything diminished,
along with my fear.

I tight hugged her.
Still scare.

She smiled--
"Without any clue,
  I will be with you."

Thursday, September 16, 2010

ME

When i see,
deep inside me.
I see a boy,bounded.
locked in the room,
With no mercy.

Suffocation was high,
He wanted to cry,
Once he overexpressed,
Gradually became shy.

Somehow,
He unlocked the room.
Came into existence
& tried to destroy the gloom.

He was alone,
Roads were broken,hazard.
Destiny was waiting.
He was in dilemna,
He himself was creating.

But,
It was not what he wanted.
He left,
what he was granted.

He went again,
to that room.
Locked the door,
with reminders of
rain and the shore.

Sunday, August 22, 2010

JINDAGI...............THE OTHER SIDE

खुशिओ की खाक,
कशमकश की बू,
यद्यपि की आदत.
अनंत का न कोई अंत अंत .

सताए...... कितनी रे जिंदगी .

आँहो में जलन,
साँसों में चुभन.
दिमाग में फंसी चिंगारी,
आँखों में जब्त स्याही स्याही.

भुनाए.... कितनी रे जिंदगी.

सन्नाटे में कैद स्वप्न.
सख्त होती हर डगर.
कोड़े खाते हुए दिन.
ले जाये नित कुछ छीन छीन.

ले जाये.......कितनी रे जिंदगी.

दम तोड़ता सूरज .
आजाद होता अंधकार . 
बौराया हुआ सन्नाटा,
टीस मारती हर कसक कसक.

भरमाये......कितनी रे जिंदगी.

Thursday, July 8, 2010

MERI SAJNI

दुप्पटे की ओट में,
खुद को छिपाए.
इंतज़ार में,
पलकें बिछाए.

मेरी सजनी.

खामोश है वो.
पर दिल बोल रहा हैं.
कुमकुम में
मेरे लिए ही शोर रहा है.

मेहँदी का रंग
भी सूखे जाये.
मेरी यादों को
सीने से लगाये.

मेरी सजनी

मैं दूर बहुत,
पर तू पास है मेरे.
तुझे लेकर,
मेरे सपने है बहुतेरे.

कजरिया वाले
नयनों को भिन्गाये.
सखियों के संग,
मेरे ही लिए गाये.

मेरी सजनी.

Wednesday, July 7, 2010

PRAKRITI

प्रकृति की तो बात ही है निराली,
न मानो तो देख लो-
बहता हुआ नीर या कोयलों की कवाली.

गगन नापने चले चिडियो  की टोली.
उधार्वपातित होती हुई ओस,
ओस के ऊपर फूलो में छिपी कोई रंगोली.

प्रकृति थोड़ी सी विचित्र है.
पर्वत ऊँचे, सागरों में केवल पानी,
फिर भी देखो दोनों मित्र हैं.

कहीं तो दूर दूर तक बर्फ जमी है.
कहीं हिलोर मारती लहरें हैं,
रेत से जिनको कोई दुश्मनी है.

पीपल का पेड़ भी कितना घना हैं.
और कमल  को तो देखो -
राजा है, फिर भी कीचड़ से सना है.